सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

भक्तिकाल ( सन् 1318 से 1643 ई० तक ) Golden age of Hindi literature


  • भूमिका - भारतीय धर्म साधना में भक्ति मार्ग का अपना एक अलग ही स्थान है। भारतीय चिंतन धारा में भक्ति काल एक ऐसा काल था जिसने अपने आदर्श विचारों एवं शुद्ध आध्यात्मिक कार्यक्रमों द्वारा अपना नाम स्वर्ण अक्षरों में उल्लेखित करवाया । इसी कारण भक्तिकाल को हिंदी साहित्य का स्वर्ण काल कहा जाता हैै । भक्ति आंदोलन एक ऐसा आंदोलन था जिसमें प्रत्येक जाति, वर्ग, धर्म अर्थात् प्रत्येक वर्ग के लोगों का योगदान था । अर्थात भक्ति काल प्रत्येक जाति, वर्ग एवं धर्मों के उपज का ही परिणाम था । भक्तिकालीन साहित्य तथा उसके आध्यात्मिक विचार किसी विशेष स्थान व काल के अधीन नहीं है बल्कि वो तो सार्वभौमिक है । भारत में प्राचीन काल से ही धर्म और मोक्ष की साधना के लिए तीन मुख्य मार्ग प्रचलित रहे है -  कर्म, ज्ञान तथा भक्ति । 
  • आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने " धर्म की भावनात्मक अनुुुभूति को भक्ती कहा है । "
  • आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार -। " भक्ति आंदोलन भारतीय चिंतन धारा का स्वभाविक विकास है ।"
  • कबीर ने कहा - " भक्ति द्रविड़ ऊपजी उत्तर लाया रामानंद "
  • नयनार - जो शिव के भक्त थे ।
  • आलवार - जो विष्णुु के भक्त थे ।
  • भक्ति साहित्य की दो धाराएं है -
  1. निर्गुण काव्य - इसकी दो उपधाराएं है -
( क ) ज्ञानाश्रयी शाखा - इसे संत काव्य भी कहते हैं ।
( ख ) प्रेमाश्रयी शाखा - इसे सूफी काव्य भी कहते हैं ।
2. सगुण धारा - इस की दो उपधाराएं है - 
( क ) रामभक्ति शाखा - इसमें सामाजिक मर्यादा एवं लोकमंगल का काव्य है ।
( ख ) कृष्णभक्ति शाखा - वहीं कृष्ण भक्ति काव्य प्रधानत: लोकरंजन के पक्ष को अपने कविता का विषय बनाता है ।

  • सगुण मतवाद में विष्णु के 24 अवतारों में से अनेक की उपासना होती है जैसे - राम और कृष्ण ।
  • भक्ति के संप्रदाय - प्रमुख चार वैष्णव संप्रदाय - 
  1. श्री संप्रदाय - इसके आचार्य रामानुजाचार्य है इन्होंने विशिष्टाद्वैतवाद की स्थापना की है ।
  2. ब्राह्म संप्रदाय - इसके प्रवर्तक मध्वाचार्य थे उनका जन्म गुजरात में हुआ था ।
  3. रुद्र संप्रदाय - इस के प्रवर्तक विष्णु स्वामी थे इन्होंने ' प्रेम लक्षणा ' भक्ति ग्रहण की ।
  4. सनकादि संप्रदाय - इसके प्रवर्तक निंबार्काचार्य है ।
  5. राधावल्लभी संप्रदाय - इसके प्रवर्तक हितहरिवंश थे उनका जन्म 1502 ईसवी में  मथुरा के पास बांदगांव में हुआ था ।
R.k pidiyar



टिप्पणियाँ

  1. Having faith in God with Bhakti is only way to get salvation..
    really liked your content while reading..

    You can also visit my blog by clicking below..


    Dr. Shashi Tharoor

    जवाब देंहटाएं
  2. Nice informative blog Dude!! And This blog also help me!!you’re a great SEO expert!! And im your organic visitor so give me a chance Make Backlinks and get Google Approval On blog :)

    जवाब देंहटाएं

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

रासो साहित्य ( आदिकाल ) Hindi literature

रासो साहित्य- " रासो " शब्द की व्युत्पत्ति को लेकर विद्वानों में मतभेद है । फ्रांसीसी इतिहासकार  गार्सा- द- तासी ने रासो शब्द की व्युत्पत्ति " राजसूय " से मानी है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने " रसायण " शब्द से मानी है । नरोत्तम स्वामी ने रासो शब्द की व्युत्पत्ति " रसिक " शब्द   से मानी है। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी व चंद्रबली पांडेय ने संस्कृत के " रासक " शब्द से ही रासो शब्द की व्युत्पत्ति मानी है । प्रमुख रासो साहित्य - खुमान रासो - इसका समय 9वीं शताब्दी है कुछ विद्वान इसका समय 17वीं शताब्दी मानते हैं । इसे चित्तौड़गढ़ नरेश खुमाण के समकालीन कवि दलपत विजय द्वारा रचित माना है इसकी भाषा डिंगल है । हम्मीर रासो - इसका समय 13वीं शताब्दी है इसके रचनाकार कवि शाड़र्गगधर है इसमें रणथंभौर के राव हमीर देव चौहान के शौर्य, अलाउद्दीन खिलजी द्वारा 1301 ईसवी में रणथंभौर पर किए गए आक्रमण का वर्णन है । प्राकृत पैैैैंगलम में इसके कुछ छंद मिलते है । बीसलदेव रासो - इसके रचनाकार कवि नरपति नाल्ह है । इसका समय कुछ विद्वानों ने 1272 विक्रम स...

आदिकालीन हिन्दी साहित्य की प्रमुख विशेषताएं। ( Salient features of ancient Hindi literature )

वीरगाथात्मक काव्य रचनाएं - आदिकालीन साहित्य में वीरगाथाओं का विशेष प्रचलन था जिसमें कभी कवि अपने आश्रयदाताओं की वीरता, साहस, शौर्य एवं पराक्रम को अतिरंजित बनाकर प्रस्तुत करते थे। जिस से उनमें जोश एवं    शौर्य जाग्रत होता था । युद्धों का वर्णन - आदिकालीन साहित्य से ज्ञात होता है । कि   राजा का प्रजा पर ध्यान कम और अपने साम्राज्य विस्तार पर ध्यान ज्यादा था । जिस के कारण आए दिन युद्ध के बिगुल बज उठते थे । जिसमें अनेक लोग युद्ध में वीरगति को प्राप्त हो जाते थें जिसका आदिकालीन कवियों ने बड़ा चढ़ाकर वर्णन किया है । संकुचित राष्ट्रीयता की भावना - उस समय राष्ट्रीयता की भावना का अभाव था । लोग एक दूसरे के स्वार्थ सिद्ध करने में लगे हुए थे । उस समय राष्ट्र का मतलब एक राजा था सामंत की राज्य सीमा थी जिसे वे अपना मानते थे । संपूर्ण भारत को राष्ट्र नहीं समझा गया । इसी कारण पृथ्वीरााज चौहान को शहाबुद्दीन गोरी ने पर परास्त किया । लोक भाषा का साहित्य - सातवीं शताब्दी से दसवीं शताब्दी की अपभ्रंश लोक भाषा के रूप में प्रचलित रही । इस समय के सिद्धाचार्यो , जैनाचार्यों एवं नाथ संप्र...

Time division and naming of Hindi literature ( हिन्दी साहित्य का काल विभाजन )

हिन्दी साहित्य का काल विभाजन एवं नामकरण- डॉक्टर ग्रियर्सन ने हिंदी साहित्य के इतिहास को 11 भागों में विभाजित किया। उन्होंने हिंदी साहित्य की प्रथम काल को " चारण काल "  कहा। मिश्र बंधुओं ने अपने ग्रंथ मिश्र बंधु विनोद में निम्न प्रकार से काल विभाजन किया । आरम्भिक काल (क) - पूर्वारंभिक काल  700 विक्रम संवत से 1343 विक्रम संवत                  ( ख) - उत्तरारंभिक काल - 1344 से 1444 विक्रम संवत।  माध्यमिक काल (क)- पूर्वामाध्यमिक काल 1445 से 1560 विक्रम संवत।  (ख) - प्रौढ़ माध्यमिक काल 1561 से 1680 विक्रम संवत ।  अलंकृत काल (क) - पूर्वालंकृत काल 1681 से 1790 विक्रम संवत।     (ख) - उत्तरालंकृत काल 1791 से 1889 विक्रम संवत। परिवर्तन का काल 1890 से 1925 विक्रम संवत ।  वर्तमान काल 1926 से अधावधि। (3 ) आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने हिंदी साहित्य के इतिहास को चार भागों में विभाजित किया है - (1) वीरगाथा काल 105...