सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

Time division and naming of Hindi literature ( हिन्दी साहित्य का काल विभाजन )

  • हिन्दी साहित्य का काल विभाजन एवं नामकरण-

  1. डॉक्टर ग्रियर्सन ने हिंदी साहित्य के इतिहास को 11 भागों में विभाजित किया। उन्होंने हिंदी साहित्य की प्रथम काल को " चारण काल "  कहा।
  2. मिश्र बंधुओं ने अपने ग्रंथ मिश्र बंधु विनोद में निम्न प्रकार से काल विभाजन किया ।
  • आरम्भिक काल

  • (क) - पूर्वारंभिक काल  700 विक्रम संवत से 1343 विक्रम संवत                 

  • ( ख) - उत्तरारंभिक काल - 1344 से 1444 विक्रम संवत। 
  • माध्यमिक काल

  • (क)- पूर्वामाध्यमिक काल 1445 से 1560 विक्रम संवत। 

  • (ख) - प्रौढ़ माध्यमिक काल 1561 से 1680 विक्रम संवत ।
  •  अलंकृत काल

  • (क) - पूर्वालंकृत काल 1681 से 1790 विक्रम संवत।

  •     (ख) - उत्तरालंकृत काल 1791 से 1889 विक्रम संवत।
  • परिवर्तन का काल 1890 से 1925 विक्रम संवत ।
  •  वर्तमान काल 1926 से अधावधि।
(3 ) आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने हिंदी साहित्य के इतिहास को चार भागों में विभाजित किया है -
(1) वीरगाथा काल 1050 से 1375 विक्रम संवत ।
(2) भक्ति काल 1375 से 1700 विक्रम संवत।
(3) रीतिकाल 1700 से 1900 विक्रम संवत।
(4) गद्यकाल विक्रम संवत 1900 से आज तक ।

  • आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने हिंदी साहित्य को चार भागों में विभाजित किया -
  • आदिकाल
  • पूर्व मध्यकाल
  • उत्तर मध्यकाल
  • आधुनिक काल 
5. डॉ नगेंद्र के अनुसार हिंदी साहित्य का काल विभाजन एवं नामकरण- 
(क) आदिकाल 7वीं शताब्दी के मध्य से 14 शताब्दी के मध्य 
(ख) भक्तिकाल 14 वीं शताब्दी के मध्य से 17 वीं शताब्दी के मध्य तक ।
(ग) रीतिकाल 17 वी शताब्दी के मध्य से 19वीं शताब्दी के मध्य तक।
(घ) आधुनिक काल 19वीं शताब्दी के मध्य से अब तक।

  • R . k pidiyar 
  • Instagram- Rakeshpidiyar




   

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

आदिकालीन हिन्दी साहित्य की प्रमुख विशेषताएं। ( Salient features of ancient Hindi literature )

वीरगाथात्मक काव्य रचनाएं - आदिकालीन साहित्य में वीरगाथाओं का विशेष प्रचलन था जिसमें कभी कवि अपने आश्रयदाताओं की वीरता, साहस, शौर्य एवं पराक्रम को अतिरंजित बनाकर प्रस्तुत करते थे। जिस से उनमें जोश एवं    शौर्य जाग्रत होता था । युद्धों का वर्णन - आदिकालीन साहित्य से ज्ञात होता है । कि   राजा का प्रजा पर ध्यान कम और अपने साम्राज्य विस्तार पर ध्यान ज्यादा था । जिस के कारण आए दिन युद्ध के बिगुल बज उठते थे । जिसमें अनेक लोग युद्ध में वीरगति को प्राप्त हो जाते थें जिसका आदिकालीन कवियों ने बड़ा चढ़ाकर वर्णन किया है । संकुचित राष्ट्रीयता की भावना - उस समय राष्ट्रीयता की भावना का अभाव था । लोग एक दूसरे के स्वार्थ सिद्ध करने में लगे हुए थे । उस समय राष्ट्र का मतलब एक राजा था सामंत की राज्य सीमा थी जिसे वे अपना मानते थे । संपूर्ण भारत को राष्ट्र नहीं समझा गया । इसी कारण पृथ्वीरााज चौहान को शहाबुद्दीन गोरी ने पर परास्त किया । लोक भाषा का साहित्य - सातवीं शताब्दी से दसवीं शताब्दी की अपभ्रंश लोक भाषा के रूप में प्रचलित रही । इस समय के सिद्धाचार्यो , जैनाचार्यों एवं नाथ संप्र...

रासो साहित्य ( आदिकाल ) Hindi literature

रासो साहित्य- " रासो " शब्द की व्युत्पत्ति को लेकर विद्वानों में मतभेद है । फ्रांसीसी इतिहासकार  गार्सा- द- तासी ने रासो शब्द की व्युत्पत्ति " राजसूय " से मानी है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने " रसायण " शब्द से मानी है । नरोत्तम स्वामी ने रासो शब्द की व्युत्पत्ति " रसिक " शब्द   से मानी है। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी व चंद्रबली पांडेय ने संस्कृत के " रासक " शब्द से ही रासो शब्द की व्युत्पत्ति मानी है । प्रमुख रासो साहित्य - खुमान रासो - इसका समय 9वीं शताब्दी है कुछ विद्वान इसका समय 17वीं शताब्दी मानते हैं । इसे चित्तौड़गढ़ नरेश खुमाण के समकालीन कवि दलपत विजय द्वारा रचित माना है इसकी भाषा डिंगल है । हम्मीर रासो - इसका समय 13वीं शताब्दी है इसके रचनाकार कवि शाड़र्गगधर है इसमें रणथंभौर के राव हमीर देव चौहान के शौर्य, अलाउद्दीन खिलजी द्वारा 1301 ईसवी में रणथंभौर पर किए गए आक्रमण का वर्णन है । प्राकृत पैैैैंगलम में इसके कुछ छंद मिलते है । बीसलदेव रासो - इसके रचनाकार कवि नरपति नाल्ह है । इसका समय कुछ विद्वानों ने 1272 विक्रम स...

आदिकाल ( जैन साहित्य ) Hindi literature

जैन साहित्य - आठवींं शताब्दी में जैन धर्मावलंबियों ने अपने मत का प्रचार करना शुरू कर दिया। इन्होंने जैन तीर्थंकरों के जीवन चरित्र व वैष्णव अवतारों की कथाओं को अपने सााित्य का आदर्श बनाया। अपभ्रंश भाषा में रचित साहित्य के रचनाकारों के प्रमुख कवि -  स्वंभू - इनका समय 783 ईसवी माना गया है इनकी 3 अपभ्रंश की रचनाएं उपलब्ध है - " पउम चरिउ " , " रिटठ् नेमिचरिउ ", " स्वयंभू छंद ", पुष्यदंत-  इनका समय दसवीं शताब्दी के आसपास रहा है इन को " अपभ्रंश भाषा का व्यास "  कहा जाता है । यह मान्यखेत के प्रतापी राजा महामात्य भीत के सभा कवि थे । इनके प्रमुख 3 ग्रंथ है - " णयकुुुुमार चरिउ ", " महापुराण", " जसहर चरिउ ", धनपाल- इनका समय दसवीं शताब्दी रहा। यह धक्कड़ वैैैश्य  कुल के थे। इनका मूल उद्देश्य श्रुत पंचमी व्रत के महात्म्य प्रतिपादित करना है इनकी रचना " भविष्यतकहा " है जो अपभ्रंश का लोकप्रिय महाकाव्य है । देवसेन- आचार्य देव सेन 933 ईसवी के कवि है अपभ्रंश में " श्ररावकार " इन की प्रसिद्ध रचना है इसमें 25...