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निर्गुण काव्य ( ज्ञानाश्रयी शाखा ) भक्तिकाकल Hindi literature

  • ज्ञानाश्रयी काव्य धारा और उसके प्रमुख कवि - 
  1. नामदेव - इनका जन्म 1267 ई. को महाराष्ट्र के सतारा के नरसी वमनी गांव में हुआ था संत नामदेव छीपा दर्जी थे । संत विसोवा खेचर इनके गुरु थे ।
  2. कबीर - ( 1398ई.- 1518ई. ) काशी - इनका जन्म विधवा ब्राह्मणी के घर हुआ था । जिसने लोकापवाद के भय के कारण इन्हें लहरतारा तालाब के निकट छोड़ दिया । इनका पालन-पोषण ' नीरू-नीमा' नामक जुलाहा दंपति ने किया । कबीर की मृत्यु के बारे में कहा जाता है। कि हिंदू इनके शव को जलाना चाहते थे और मुसलमान दफनाना । इससे विवाद हुआ, किंतु पाया गया । कि कबीर का शरीर अंतर्धान हो गया है वहां कुछ फूल है उनमें से कुछ फूलों को हिंदुओं ने जलाया व कुछ को मुसलमानों ने दफनाया । उनकी पत्नी का नाम ' लोई' था इनकी संतान के रूप में पुत्र कमाल व पुत्री कमाली का उल्लेख है । रामानंद इनके दीक्षा गुरु थे । कबीर के शिष्य धर्मदास ने इनकी वाणी का संग्रह किया। जिसे " बीजक " कहा जाता है । इसके 3 भाग है - साखी,सबद, रमैनी । रमैनी व सबद गाने के पद है जो ब्रज भाषा में है तथा साखी दोहा छंद में हैं। कबीर की भाषा 'सधुक्कड़ी' है ‌। कबीर को " वाणी का डिक्टेटर " कहा जाता है ।
  3. रैदास या रविदास - इनके गुरु का नाम रामानंद था। मीरा इनकी शिष्या थी। इनकी रचनाओं का कोई व्यवस्थित संकलन नहीं है। " आदि ग्रंथ " में इनके कुछ पद मिलते हैं कुछ फुटकल पद " सतवानी " में  है।
  4. गुरु नानक देव - ( 1469 - 1531ईं. ) - इनका जन्म सन् 1469 में तलवंडी ग्राम, जिला लाहौर में हुआ था इनके पिता का नाम कालूचंद खत्री और माता का नाम तृप्ता था। इनकी पत्नी का नाम सुलक्षणी था। गुरु नानक ने सिख धर्म का प्रवर्तन किया इनकाा अधिकांश साहित्य पंजाबी में हैं, किंतु कहीं-कहीं बृजभाषा- खड़ी बोली का प्रयोग मिलता है। इनकी बानियो का संग्रह " आदि ग्रंथ" के ' महला ' नामक खंड में हैं‌। 
  5. दादू दयाल - ( 1544 - 1603 ईं ) - दादू पंथ के प्रवर्तक दादू दयाल का जन्म गुजरात प्रदेश के अहमदाबाद नगर में हुआ  था इनकी मृत्यु राजस्थान के जयपुर के निकट नराणा गांव में हुई । जहां इनके अनुयायियों का प्रधान मठ ' दादू द्वारा ' विराजमान हैं । दादू को " परम ब्रह्म संप्रदाय " का प्रवर्तक माना जाता है बाद में इसे दादू पंथ के नाम से संबोधित किया गया । प्रोफेसर चंद्रिका प्रसाद त्रिपाठी और क्षिति मोहन सेन के अनुसार दादूू मुस्लमान थे और उनका नाम 'दाऊद' था। कहते हैं कि दादू बालक रूप में साबरमती नदी में बहतेे हुए लोदीराम नामक ब्राह्मण को मिले थे । दादूू की रचनाओं का संग्रह इनके शिष्यों संतदास और जगन्नाथ दास ने " हरडेवानी " नाम से किया है उनके प्रमुख शिष्य ' रज्जब ' ने  इसमें पाई जाने वाली त्रुटियों को सुधारकर उसे " अंगवधू " नाम से प्रस्तुत किया था। दादू की एक अन्य रचना " कायाबेली " हैं । इनकी रचनाओं की भाषा पश्चिमी राजस्थानी से प्रभावित हिंदी है। दादू की वाणी में ईश्वर की सर्वव्यापकता, सद्गुरु महिमा, आत्मबोध व संसार की अनित्यता का निरूपण हुआ है ।
  6. सुंदर दास - ( 1596 - 1689ई. ) - इनका जन्म जयपुर राज्य की प्राचीन राजधानी धौसा नामक स्थान पर हुआ । सुंदर दास 6 वर्ष की आयु में दादू के शिष्य को गए थे। निर्गुण संत कवियों में सुंदर दास सर्वाधिक शास्त्रज्ञ एवं सुशिक्षित थे। यह अपने नाम के अनुरूप अत्यंत सुंदर थे। इनकेे ग्रंथों की संख्या 42 है । जिनमें सर्वाधिक प्रसिद्ध रचना " सुंदर विलास " है।
  7. मलूकदास - ( 1574 - 1682 ) - इनका जन्म इलाहाबाद के कड़ा नामक गांव में हुआ । इनके पिता का नाम सुंदर दास खत्री था 106 वर्ष की आयु में इनकी मृत्यु हुई । निर्गुण मत के प्रसिद्ध संत की गदिया कड़ा, जयपुर, गुजरात, मुल्तान, पटना, नेपाल और काबुल तक कायम हुई । कुछ इन्हें कील का शिष्य मानते हैं और कुछ द्रविड़ विट्ठल को इनका गुरू बताते हैं । किंतु मलूक दास ने सुख सागर में गुरु देवनाथ के पुत्र पुरुषोत्तम का गुरु रूप में स्मरण किया है । इन्होंने अवधी और बृजभाषा में काव्य रचना की । प्रमुख रचनाएं - रतनखान ,ज्ञान बोध । अन्य - सुख सागर, बृज लीला, ध्रुव चरित्र, भक्ति विवेक, ज्ञानपरोधि, राम अवतार लीला आदि । आलसियों का यह मूल मंत्र - " अजगर करै न चाकरी, पंछी करै न काम । दास मलूका कह गए, सबके दाता राम ।।
  8. रज्जब - ( 17 वीं शताब्दी ) - यह दादू के शिष्य थे राजस्थान के थे प्रेम रस को रज्जब ने अपने प्रतिभा में विशेष स्थान दिया है - " सबसे निर्मल प्रेम रस, पल पल पोषै प्राण । जन रज्जब छाक्या रहै , साधु संत सुजान ।।
  • अन्य कवि - अक्षर अनन्य,जंभनाथ, सिंगाजी, हरिदास निरंजनी, कबीर के पुत्र कमाल और शिष्य धर्मदास आदि ।
  • R.k pidiyar


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